80 के दशक से 2026 तक: मुस्लिम समाज ने क्या खोया, क्या पाया और राजनीतिक शून्यता तक कैसे पहुंचा?

विशेष रिपोर्ट:मुस्तकीम मंसूरी 

आर्थिक पिछड़ापन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व में गिरावट, सामाजिक चुनौतियां और नेतृत्व संकट के बीच मुस्लिम समाज के सामने खड़े बड़े सवाल

भारत की आजादी के बाद मुस्लिम समाज ने देश के निर्माण, शिक्षा, व्यापार, कला, साहित्य और राजनीति में महत्वपूर्ण योगदान दिया। लेकिन यदि 1980 के दशक से लेकर वर्तमान समय तक की यात्रा का विश्लेषण किया जाए तो यह प्रश्न लगातार उठता है कि मुस्लिम समाज ने आखिर क्या खोया और क्या पाया? विशेषकर उत्तर प्रदेश जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य में मुस्लिम समाज की वर्तमान राजनीतिक स्थिति पर गंभीर बहस की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

आर्थिक मोर्चे पर क्या मिला और क्या छूटा?

1980 के दशक में मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग छोटे व्यापार, दस्तकारी, बुनकरी, चमड़ा उद्योग, पीतल उद्योग और पारंपरिक व्यवसायों से जुड़ा हुआ था। वैश्वीकरण, बदलती आर्थिक नीतियों और तकनीकी परिवर्तन के दौर में जहां अन्य वर्गों ने नए अवसरों को तेजी से अपनाया, वहीं मुस्लिम समाज का बड़ा हिस्सा आधुनिक आर्थिक प्रतिस्पर्धा में पीछे छूटता चला गया।
शिक्षा और सरकारी नौकरियों में सीमित भागीदारी के कारण आर्थिक सशक्तिकरण की गति अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी। हालांकि एक नया शिक्षित मध्यम वर्ग अवश्य उभरा है, लेकिन उसकी संख्या अभी भी समाज की कुल आबादी के अनुपात में कम मानी जाती है।

सामाजिक स्तर पर बढ़ी जागरूकता, लेकिन चुनौतियां बरकरार

पिछले चार दशकों में शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में कुछ सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। बड़ी संख्या में मुस्लिम युवाओं ने उच्च शिक्षा और तकनीकी क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई है।
इसके बावजूद शिक्षा में पिछड़ापन, रोजगार की कमी, सामाजिक असुरक्षा और संसाधनों तक सीमित पहुंच जैसी समस्याएं आज भी बड़ी चुनौतियों के रूप में मौजूद हैं।

धार्मिक पहचान मजबूत हुई, लेकिन संस्थागत विकास सीमित रहा

धार्मिक शिक्षा और पहचान के स्तर पर मुस्लिम समाज पहले की तुलना में अधिक संगठित दिखाई देता है। मस्जिदों, मदरसों और धार्मिक संस्थाओं की संख्या में वृद्धि हुई है।
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि धार्मिक संस्थाओं के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा, शोध, तकनीकी प्रशिक्षण और सामाजिक विकास के संस्थानों का निर्माण भी उसी गति से होना चाहिए था, जो नहीं हो पाया।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व: सबसे बड़ी गिरावट का क्षेत्र

यदि सबसे बड़ा नुकसान किसी क्षेत्र में हुआ है तो वह राजनीतिक प्रतिनिधित्व का क्षेत्र माना जा सकता है।
1980 और 1990 के दशक में मुस्लिम समाज उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक निर्णायक मतदाता वर्ग था। विभिन्न राजनीतिक दल मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में करने के लिए विशेष रणनीतियां बनाते थे।
समय के साथ मुस्लिम समाज का राजनीतिक प्रभाव मतदाता के रूप में तो बना रहा, लेकिन नेतृत्वकर्ता और सत्ता-साझेदार के रूप में उसकी भूमिका लगातार कमजोर होती चली गई।
आज स्थिति यह है कि बड़ी आबादी होने के बावजूद मुस्लिम समाज का स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व सीमित दिखाई देता है और सत्ता के महत्वपूर्ण निर्णयों में उसकी प्रत्यक्ष भागीदारी पहले की तुलना में काफी कम हो गई है।

राजनीतिक शून्यता के लिए कौन जिम्मेदार?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इसके लिए केवल एक दल या एक व्यक्ति को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
कांग्रेस के कमजोर होने के बाद मुस्लिम समाज ने क्षेत्रीय दलों पर भरोसा किया। उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से समाजवादी राजनीति और बहुजन राजनीति के साथ मुस्लिम समाज का बड़ा जुड़ाव रहा।
आलोचकों का आरोप है कि कई राजनीतिक दलों ने मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया, लेकिन नेतृत्व निर्माण, शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए दीर्घकालिक प्रयास नहीं किए।
दूसरी ओर मुस्लिम समाज के भीतर भी स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व तैयार करने, बौद्धिक संस्थानों को मजबूत करने और नई पीढ़ी को राजनीतिक प्रशिक्षण देने की दिशा में पर्याप्त प्रयास नहीं हुए।

मुस्लिम समाज को कहां होना चाहिए था?

विशेषज्ञों का मानना है कि देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले समुदाय के रूप में मुस्लिम समाज को 
  आज शिक्षा में राष्ट्रीय औसत से बेहतर स्थिति में होना चाहिए था।
प्रशासनिक सेवाओं और सरकारी नौकरियों में मजबूत प्रतिनिधित्व होना चाहिए था।
विधानसभा और संसद में प्रभावी नेतृत्व होना चाहिए था।
व्यापार और उद्योग के बड़े क्षेत्रों में निर्णायक भागीदारी होनी चाहिए थी।
थिंक टैंक, शोध संस्थानों और मीडिया में मजबूत उपस्थिति होनी चाहिए थी। 
राजनीतिक विशेषज्ञों और सामाजिक चिंतकों के अनुसार मुस्लिम समाज को केवल चुनावी राजनीति तक सीमित सोच से बाहर निकलना होगा।
समाज को चाहिए कि 
  वह शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बनाए।
स्थानीय निकायों से लेकर संसद तक नेतृत्व तैयार करे।
सामाजिक और आर्थिक संस्थानों को मजबूत बनाए।
युवाओं को प्रशासनिक सेवाओं और आधुनिक व्यवसायों की ओर प्रेरित करे।
राजनीतिक दलों पर निर्भर रहने के बजाय वैचारिक और बौद्धिक नेतृत्व विकसित करे।
लोकतांत्रिक भागीदारी को केवल मतदान तक सीमित न रखकर नीति-निर्माण तक पहुंचाने का प्रयास करे।
मुस्लिम समाज की वर्तमान स्थिति केवल राजनीतिक विमर्श का विषय नहीं बल्कि आत्ममंथन का भी विषय है। पिछले चार दशकों में समाज ने कुछ उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक क्षेत्रों में अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी। आने वाला समय इस बात पर निर्भर करेगा कि समाज अपनी ऊर्जा को भावनात्मक मुद्दों से आगे बढ़ाकर शिक्षा, आर्थिक विकास, संस्थागत निर्माण और नेतृत्व विकास की दिशा में कितना केंद्रित कर पाता है।

Comments

Popular posts from this blog

जमा-ए-अनवर पब्लिक स्कूल में प्ले ग्रुप से कक्षा 8वीं तक का परीक्षा फल वितरण हुआ रिपोर्ट कार्ड देखकर बच्चों के खिल उठे चेहरे*

बरेली शहर सीट पर सपा के ‘एजुकेशन आइकन’ मोहम्मद कलीमुद्दीन की दमदार दावेदारी, हजारों छात्रों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाकर बनाई मजबूत पहचान

पुलिस ने उसके बाप व भाई का भी धारा 170 बी एन एस एस में चालान कर एसडीएम नगीना की न्यायालय में पेश किया गया। जहां से दोनों को जमानत नहीं मिलने पर बेकसूर बाप बेटे को जाना पड़ गया जेल।