साजिशी अभियान के निशाने पर वकील

मुनेश त्यागी 

     आजकल सोशल मीडिया, अखबारों और कई जजों के निशाने पर वकालत का पेशा और वकील छाए हुए हैं। वकीलों को बदनाम करने का एक निरंतर अभियान जारी है। पिछले दिनों यह मुद्दा तब सामने आया जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने कुछ वकीलों को "परजीवी" और "कॉकरोच" बता दिया। अभी दो दिन पहले बार काउंसिल आफ इंडिया के अध्यक्ष का बयान आया है कि वकालत के पेशे में 30 से 40% फर्जी वकील हैं।  पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के लखनऊ में वकीलों के सैकड़ों चैंबर्स ढा दिए गए। यह साजिश तब अपने शिखर पर पहुंच गई जब पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत, एक बहुत ही अहम मुद्दे पर, मेरठ के डीएसपी ने बार एसोसिएशनों के अध्यक्षों और महामंत्रियों के डेलिगेशन से, मिलने से मना कर दिया।
    यहां पर सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है की आखिर वकालत के गरिमा में पैसे को जान पहुंचकर एक साजिश के तहत क्यों बदनाम किया जा रहा है? वकीलों को बदनाम करने के पीछे ज्यूडिशरी और बार काउंसिल का अध्यक्ष क्यों पड़ गया है और अब वकीलों और इस गरिमामय पेशे को क्यों निशाने पर लिया जा रहा है? वकील अपने गरिमा में पैशे के अनुसार सस्ते और सुलभ न्याय की मांग सरकार से बहुत दिनों से करते आ रहे हैं और सरकार इस संवैधानिक और कानूनी मांग को लगातार ठुकराती चली आ रही है और वकीलों की इन जायज़ मांगों का जवाब भी नहीं दे रही है।
    इसके कई मुख्य कारण है। पहला कारण है कि वकीलों ने देश और दुनिया में अन्यायपूर्ण समाज, व्यवस्था और सरकार को बदलने और समाज में न्यायिक व्यवस्था कायम करने के अनेक आंदोलनों का नेतृत्व किया है। इसमें नेल्सन मंडेला, कार्ल मार्क्स, लेनिन, फिदेल कास्त्रो, जवाहरलाल नेहरू, मोतीलाल नेहरू, डॉ भीमराव अम्बेडकर, राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे विश्व विख्यात क्रांतिकारी विचारकों, लेखकों और नेताओं के नाम शामिल हैं। इसी क्रम में वकीलों के कई संगठनों ने राष्ट्रीय स्तर पर,, वकीलों के संगठन बनाएं जिनमें सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के बहुत सारे रिटायर्ड जज भी शामिल हुए और उन्होंने सरकार की न्याय विरोधी प्रणाली की आलोचना की और जनता को सस्ता और सुलभ न्याय देने, संविधान की रक्षा करने, संविधान के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने और सरकार की जन विरोधी नीतियों का विरोध किया और सरकार से मांग की कि कानून के शासन और संवैधानिक मूल्यों के अनुसार, जनता को उसके बुनियादी अधिकार और सस्ता और सुलभ न्याय दिया जाए।
    इसका अगला और एक बहुत महत्वपूर्ण कारण है कि वकील समुदाय ही सरकार के सभी, कानून के शासन विरोधी, संविधान विरोधी और सरकार के कई मनमाने कानूनों और कदमों के खिलाफ आवाज उठाता है, उनकी आलोचना करता है और उन्हें जन कल्याणकारी बनाकर, लागू करने की मांग करता है। वकील समुदाय ही न्यायालयों में पुलिस प्रशासन और सरकार के, जन विरोधी, अवैधानिक और मनमाने कारनामों और कदमों का विरोध करता है, अदालतों में उसका जमकर विरोध करता है और सरकार की तानाशाही और मनमाने रवैये को पूरा नहीं होने देता। सरकार अपने मनमानी कार्यवाहियों में वकीलों और पूरे वकील समुदाय के इस न्यायिक कार्य को, एक रोड समझती है, अवरोध समझती है। इसी वजह से वकील समुदाय, सरकार और न्यायपालिका और बार काउंसिल के पदाधिकारियों का निशाना बनता जा रहा है। 
    अब एक सोची समझी साजिश के तहत, पूरे के पूरे वकील समुदाय और कानूनी पेशे को जानबूझकर बदनाम किया जा रहा है। वकालत का गरिमामय पेशा, आम जनता के सम्मान का पात्र है, बहुत सारे लोग वकीलों की बातों को समझते हैं और उनका समर्थन करते हैं, इसीलिए वकीलों को बदनाम करने के लिए इस गरिमामय पेशे को बदनाम किया जा रहा है।
      वकीलों पर आरोप लगाया जा रहा है कि वकालत के पैशे में 30 से 40% वकील फर्जी हैं। यहीं पर सबसे बड़ा सवाल उठता है कि यह फर्जी वकील कहां से आएं? इन्होंने डिग्रियां कहां से प्राप्त कीं? कौन से विश्वविद्यालय से इन्हें डिग्रियां मिलीं? सरकार उस समय क्या कर रही थी? और इन डिग्रियों को कौन बांट रहा था? सरकार ने उस समय क्या कदम उठाये? सरकार ने डिग्रियां बांटने वालों के खिलाफ क्या कानूनी कार्रवाईयां कीं? इसका सरकार के पास कोई जवाब नहीं है।
     भारतीय समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून के पेशे को सबसे ज्यादा गरिमामय समझा जाता है। पूरी जनता उनका सम्मान करती है। अब सरकार की गलत नीतियों के कारण शिक्षा और स्वास्थ्य के गरिमामय पेशे के खिलाफ आवाज़ उठाई जा रही हैं सिर्फ वकालत का पेशा बचा हुआ है, जहां पर वकील अपने गरिमामय पेशे को बचाए हुए हैं, जनता के लिए सस्ता और सुलभ न्याय मांग रहे हैं, सरकार की जन विरोधी, कानून विरोधी, संविधान विरोधी और मनमानी, तानाशाहीपूर्ण नीतियों और रवैये का  कानूनी विरोध करते हैं। सरकार इसे अपने रास्ते में एक रोडा समझती है, इसलिए अब एक साथ साजिश के तहत, जान पूछकर, वकीलों और वकालत के गरिमामय पेशे को बदनाम करने का अभियान शुरू कर दिया है। वकील समुदाय आज भी संघर्षरत है। वह कानून के शासन और संविधान के बुनियादी सिद्धांतों का समर्थन है और जनता के लिए सस्ता और सुलभ न्याय मांग रहा है, वह इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। वह इसका जमकर विरोध करेगा और वह अपनी ऐतिहासिक भूमिका को निभाता रहेगा।

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