डिजिटल मूल्यांकन पर उठे सवाल

रिपोर्ट-मुस्तकीम मंसूरी 

“ऑन-स्क्रीन मार्किंग” की गड़बड़ियों ने छात्रों के भविष्य और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर खड़े किए गंभीर प्रश्न

तकनीक से पारदर्शिता लाने का दावा, लेकिन स्कैनिंग त्रुटियों, पुनर्मूल्यांकन और जवाबदेही के संकट ने शिक्षा-न्याय पर गहरी बहस छेड़ी

डिजिटल मूल्यांकन का सपना और विद्यार्थियों की पीड़ा

तकनीक, जवाबदेही और शिक्षा-न्याय के बीच खड़ा एक गंभीर प्रश्न

भारत की शिक्षा व्यवस्था केवल परीक्षा परिणामों से नहीं, बल्कि उस भरोसे से पहचानी जाती है जो वह अपने विद्यार्थियों और अभिभावकों के मन में पैदा करती है। परीक्षा किसी छात्र के लिए महज़ अंक प्राप्त करने की प्रक्रिया नहीं होती; वह उसके वर्षों के परिश्रम, परिवार की उम्मीदों और भविष्य के सपनों का आधार होती है। ऐसे में यदि मूल्यांकन प्रणाली में गंभीर त्रुटियाँ सामने आती हैं, तो उसका प्रभाव केवल प्रशासनिक स्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा देता है।
इसी संदर्भ में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा बारहवीं कक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं के “ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम” के माध्यम से किए गए डिजिटल मूल्यांकन को लेकर देशभर में उठी शिकायतों ने एक बड़े शिक्षा-संकट की ओर संकेत किया है। डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली का उद्देश्य मूल्यांकन प्रक्रिया को अधिक तेज, पारदर्शी और मानकीकृत बनाना था। आधुनिक तकनीक के माध्यम से त्रुटियों को कम करने और परिणाम प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित करने का प्रयास अपने आप में सकारात्मक माना गया। लेकिन किसी भी तकनीकी सुधार की सफलता केवल उसके उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन की गुणवत्ता से तय होती है। और यहीं सबसे बड़ी चूक दिखाई दी।
परिणाम घोषित होने के बाद देश के कई हिस्सों से विद्यार्थियों और अभिभावकों ने शिकायतें दर्ज कराईं कि उन्हें अपेक्षा से बेहद कम अंक प्राप्त हुए हैं। जब उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन की गई प्रतियाँ सामने आईं, तो कई जगह पन्ने धुंधले पाए गए, कहीं उत्तर अधूरे दिखाई दिए, तो कहीं स्कैनिंग इतनी खराब थी कि लिखी गई सामग्री पढ़ना कठिन हो गया। यह स्थिति केवल तकनीकी कमी नहीं, बल्कि मूल्यांकन की निष्पक्षता पर सीधा प्रश्न बन गई। यदि परीक्षक के सामने उत्तर स्पष्ट ही नहीं हों, तो अंकन की विश्वसनीयता कैसे सुनिश्चित की जा सकती है?
एक विद्यार्थी के जीवन में एक-एक अंक का अत्यधिक महत्व होता है। विश्वविद्यालयों में प्रवेश, कट-ऑफ सूची, छात्रवृत्ति, विषय चयन और प्रतियोगी परीक्षाओं की पात्रता जैसे कई अवसर अंकों पर निर्भर करते हैं। ऐसे में मूल्यांकन की किसी भी त्रुटि का सीधा प्रभाव छात्र के भविष्य पर पड़ता है। कई बार केवल एक अंक की कमी किसी प्रतिभाशाली विद्यार्थी को प्रतिष्ठित संस्थान में प्रवेश से वंचित कर देती है। इसलिए यह कहना पर्याप्त नहीं कि “पुनर्मूल्यांकन की सुविधा उपलब्ध है।” असली प्रश्न यह है कि जो अवसर समय पर छिन गया, जो मानसिक दबाव छात्र और उसके परिवार ने झेला, उसकी भरपाई कौन करेगा?
सीबीएसई द्वारा पुनर्मूल्यांकन और पुनःस्कैनिंग की व्यवस्था किए जाने के बावजूद यह विवाद समाप्त नहीं होता। यदि हजारों उत्तर पुस्तिकाओं को दोबारा स्कैन करना पड़ा और बड़ी संख्या में पुनर्मूल्यांकन कराना पड़ा, तो यह केवल कुछ तकनीकी गड़बड़ियों का मामला नहीं कहा जा सकता। यह संकेत है कि पूरी प्रणाली के संचालन में कहीं न कहीं गंभीर खामी मौजूद थी। जिस तकनीक को “त्रुटिहीन” बताकर लागू किया गया, वही स्वयं अपनी विश्वसनीयता सिद्ध करने में संघर्ष करती दिखाई दी।
इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पक्ष यह है कि ऐसी व्यवस्थाओं का सबसे अधिक नुकसान उन छात्रों को उठाना पड़ता है, जिनकी आवाज़ पहले से ही कमजोर होती है। ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थी, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे और ऐसे अभिभावक जो डिजिटल प्रक्रियाओं और प्रशासनिक औपचारिकताओं से परिचित नहीं हैं, वे पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया तक पहुँचने में भी कठिनाई महसूस कर सकते हैं। कुछ के पास फीस भरने की क्षमता नहीं होती, कुछ के पास तकनीकी जानकारी का अभाव होता है, और कई लोग व्यवस्था के सामने अपनी शिकायत दर्ज कराने का साहस तक नहीं जुटा पाते। परिणामस्वरूप, त्रुटिपूर्ण प्रणाली का सबसे बड़ा बोझ समाज के वही वर्ग उठाते हैं जो पहले से ही संघर्ष कर रहे होते हैं।
समस्या केवल अंक तक सीमित नहीं रहती। बोर्ड परिणाम घोषित होने के साथ ही विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रवेश प्रक्रिया शुरू हो जाती है। कट-ऑफ निकल जाती है, सीटें भर जाती हैं और छात्र पीछे छूट जाता है। यदि बाद में पुनर्मूल्यांकन के माध्यम से अंक बढ़ भी जाएँ, तब भी खोया हुआ अवसर वापस नहीं आता। एक संशोधित अंकपत्र उस मानसिक पीड़ा और अवसर-हानि की भरपाई नहीं कर सकता जो गलत परिणाम के कारण समय पर हुई।
भारत की पारंपरिक मूल्यांकन प्रणाली पहले से ही कई चुनौतियों से जूझती रही है। परीक्षकों पर अत्यधिक कार्यभार, प्रशिक्षण की कमी और प्रशासनिक लापरवाही की शिकायतें नई नहीं हैं। लेकिन डिजिटल विफलता और मानवीय भूल में एक महत्वपूर्ण अंतर है। पारंपरिक व्यवस्था में कम-से-कम जिम्मेदार व्यक्ति की पहचान संभव होती है, जबकि डिजिटल प्रणाली में गलती कई परतों में बिखर जाती है। स्कैनिंग, सॉफ्टवेयर, डेटा प्रबंधन, आउटसोर्सिंग और तकनीकी संचालन। परिणामस्वरूप जवाबदेही धुंधली हो जाती है और दोष पूरी व्यवस्था में फैल जाता है।
यहीं भारत की नीति-निर्माण प्रक्रिया की एक बड़ी कमजोरी भी सामने आती है। कई बार तकनीकी आधुनिकता के नाम पर योजनाएँ तेज़ी से लागू कर दी जाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर आवश्यक संसाधन, प्रशिक्षण, निगरानी और परीक्षण की पर्याप्त तैयारी नहीं होती। लाखों उत्तर पुस्तिकाओं का उच्च-गुणवत्ता वाला डिजिटलीकरण कोई साधारण प्रशासनिक कार्य नहीं है। इसके लिए मज़बूत तकनीकी ढाँचा, प्रशिक्षित मानवबल, पायलट प्रोजेक्ट, गुणवत्ता परीक्षण और लगातार निगरानी आवश्यक होती है। यदि इनमें से कोई भी स्तंभ कमजोर हो, तो तकनीक सुविधा के बजाय संकट का कारण बन जाती है।
इस मामले में आउटसोर्सिंग की भूमिका भी चर्चा का विषय बनी हुई है। जब अत्यंत संवेदनशील कार्य निजी एजेंसियों या अस्थायी कर्मचारियों के हवाले किए जाते हैं, तब गुणवत्ता और जवाबदेही दोनों प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र को केवल लागत और समय-सीमा के आधार पर नहीं चलाया जा सकता। यहाँ प्रत्येक त्रुटि लाखों विद्यार्थियों के भविष्य को प्रभावित कर सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी प्रणालियों को लागू करने से पहले स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट, सुरक्षा परीक्षण और चरणबद्ध पायलट प्रोजेक्ट अनिवार्य होने चाहिए। किसी भी डिजिटल सुधार का पहला सिद्धांत यह होना चाहिए कि “तकनीक छात्र के हित में हो, उसके खिलाफ नहीं।” यदि कोई प्रक्रिया विद्यार्थियों में असुरक्षा, भ्रम और तनाव पैदा कर रही है, तो उसका पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है।
संसदीय स्तर पर इस मुद्दे का उठना निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत माना जा सकता है, लेकिन यदि जांच केवल औपचारिकता बनकर रह गई, तो भविष्य में ऐसी घटनाएँ दोबारा सामने आ सकती हैं। आवश्यकता इस बात की है कि शीर्ष अधिकारियों, तकनीकी एजेंसियों और संबंधित संस्थाओं की स्पष्ट जवाबदेही तय हो। केवल रिपोर्ट तैयार कर देने या फीस वापस करने से शिक्षा-न्याय स्थापित नहीं होगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा व्यवस्था में तकनीक को मनुष्यता के अधीन रखा जाए, न कि मनुष्यता को तकनीक के अधीन। “डिजिटल इंडिया” का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा जब तकनीक विद्यार्थियों के लिए अधिक भरोसेमंद, पारदर्शी और न्यायपूर्ण व्यवस्था तैयार करे। यदि वह अवसर-हानि और मानसिक तनाव का कारण बन रही है, तो सुधार की दिशा पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है।
यह मामला केवल एक बोर्ड परीक्षा की गड़बड़ी नहीं है, बल्कि उस बड़े सवाल का हिस्सा है कि क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था वास्तव में संवेदनशील, जवाबदेह और भविष्य-उन्मुख बन पाएगी। क्योंकि शिक्षा में गलती केवल अंकों की नहीं होती-वह विश्वास की होती है। और जब विश्वास टूटता है, तो उसका असर केवल अंकपत्र पर नहीं, बल्कि पूरे भविष्य पर पड़ता है।
इसलिए ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम की विफलताओं को एक सामान्य तकनीकी समस्या मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। इसे एक गंभीर चेतावनी की तरह देखा जाना चाहिए, ताकि भविष्य में तकनीक विद्यार्थियों के सपनों के खिलाफ नहीं, बल्कि उनके साथ खड़ी दिखाई दे।

Comments

Popular posts from this blog

जमा-ए-अनवर पब्लिक स्कूल में प्ले ग्रुप से कक्षा 8वीं तक का परीक्षा फल वितरण हुआ रिपोर्ट कार्ड देखकर बच्चों के खिल उठे चेहरे*

बरेली शहर सीट पर सपा के ‘एजुकेशन आइकन’ मोहम्मद कलीमुद्दीन की दमदार दावेदारी, हजारों छात्रों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाकर बनाई मजबूत पहचान

पुलिस ने उसके बाप व भाई का भी धारा 170 बी एन एस एस में चालान कर एसडीएम नगीना की न्यायालय में पेश किया गया। जहां से दोनों को जमानत नहीं मिलने पर बेकसूर बाप बेटे को जाना पड़ गया जेल।