बशीर बद्र चले गए हैं ज़माने को छोड़कर



मुशायरों में अपनी ग़ज़ल सुनाने को छोड़कर,
बशीर बद्र  चले गए  हैं  ज़माने  को  छोड़कर।

ऐसा लगा कि छिन गया, घर का  कोई चराग़,
वो  क्या  चले  गए  हैं  सिरहाने  को  छोड़कर।

अब  कौन  दर्द  को  इतनी   नर्मी   से  कहेगा,  
सारे  अल्फ़ाज़  रो  रहें  हैं  तराने को छोड़कर।

महफ़िल  में  हर तरफ़ है, अंधेरों का धुंआ सा,
जुगनू  क्या उड़ गए  हैं  ठिकाने  को  छोड़कर।

उनकी  सदा  में   प्यार,  मोहब्बत,  वफ़ा  रही,  
नफ़रत  को   दूर  रखा,  बहाने  को  छोड़कर।

कितने  ही  टूटे  दिल  थे  जिन्हें  हौसला मिला,  
वो  जा  चुके  हैं  दर्द  के  ख़ज़ाने को छोड़कर।

सूनी  पड़ी हैं आज  ये  महफ़िल  की  कुर्सियाँ,  
सब  लोग  उठ  गए   हैं  बहाने   को  छोड़कर।

मेरे  किताब-ए-दिल   में  महकेंगे   उनके  शेर,
जैसे  गुलाब  महकते हैं  वीराने  को  छोड़कर।

"ज़फ़र"  ये  दौर-ए-शायरी  सूना-सा  हो  गया,
अहले-सुख़न चले गए हैं  फ़साने को छोड़कर।

ज़फ़रुद्दीन ज़फ़र 
F-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली -32
zzafar08@gmail.com 
9811720212

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