बरेली में बेसमेंट अस्पतालों पर कार्रवाई या औपचारिकता? स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
दिल्ली और लखनऊ अग्निकांड के बाद चला अभियान, लेकिन कार्रवाई की प्रभावशीलता पर सवाल
रिपोर्ट। मुस्तकीम मंसूरी
बरेली। दिल्ली और लखनऊ में हुए अग्निकांडों के बाद शासन स्तर से अस्पतालों में फायर सेफ्टी और भवन मानकों के अनुपालन को लेकर सख्ती के निर्देश दिए गए। इसके बाद बरेली में मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) के निर्देश पर स्वास्थ्य विभाग, बरेली विकास प्राधिकरण (बीडीए) और अग्निशमन विभाग की संयुक्त टीम ने बेसमेंट में संचालित अस्पतालों के खिलाफ अभियान चलाया। हालांकि, इस कार्रवाई को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि यदि पहले चरण में नियमों के अनुरूप प्रभावी और कठोर कार्रवाई की गई होती, तो कुछ ही समय बाद दोबारा उसी प्रकार का अभियान चलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इससे विभागीय कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, पूर्व में नोडल अधिकारी डॉ. अमित कुमार, डॉ. अजय कुमार, डॉ. लईक अंसारी और उनकी टीम ने पीलीभीत रोड स्थित केजीएन सहारा अस्पताल में निरीक्षण किया था। उस दौरान बेसमेंट में संचालित ऑपरेशन थिएटर, पैथोलॉजी लैब और दो वार्डों पर ताला लगाकर कार्रवाई की गई थी।
लेकिन लखनऊ अग्निकांड के बाद उसी अस्पताल को पूरी तरह सील कर दिया गया। इससे यह सवाल उठ रहा है कि यदि बेसमेंट में अस्पताल संचालन नियमों के विरुद्ध था, तो पहले केवल आंशिक कार्रवाई क्यों की गई? और यदि पहले सब कुछ नियमों के अनुरूप था, तो बाद में अचानक पूरी सीलिंग की आवश्यकता क्यों पड़ी?
मौर्य अस्पताल की कार्रवाई भी बनी चर्चा का विषय
इसी प्रकार बेसमेंट में संचालित बताए जा रहे मौर्य अस्पताल में ऑपरेशन थिएटर और आईसीयू को सील किया गया। इस कार्रवाई के बाद भी यह सवाल सामने आया कि यदि बेसमेंट में चिकित्सा सेवाएं नियमों के विरुद्ध थीं, तो पूर्व में अस्पताल संचालन की अनुमति कैसे बनी रही?
नोडल अधिकारियों की भूमिका पर उठ रहे सवाल
स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई के बाद विभागीय अधिकारियों की भूमिका पर भी चर्चा तेज हो गई है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या निरीक्षण करने वाले अधिकारियों को संबंधित नियमों और शासनादेशों की पूरी जानकारी थी? यदि जानकारी होने के बावजूद समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई, तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी? वहीं यदि जानकारी नहीं थी, तो ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति और निगरानी की जिम्मेदारी भी संबंधित उच्च अधिकारियों पर आती है।
'दो वर्षों के पंजीकरण की जांच हो जाए तो सामने आ सकता है बड़ा मामला'
स्वास्थ्य विभाग के एक जिम्मेदार अधिकारी ने, नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर, दावा किया कि यदि पिछले दो वर्षों में अस्पतालों, नर्सिंग होम और क्लीनिकों को दिए गए पंजीकरणों की निष्पक्ष जांच करा ली जाए, तो कई अनियमितताएं सामने आ सकती हैं।
उनका कहना है कि यदि शासन के दिशा-निर्देशों का शत-प्रतिशत पालन करते हुए पंजीकरण किए जाएं, तो विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार का बड़ा हिस्सा स्वतः समाप्त हो सकता है।
'अवैध अस्पतालों की जानकारी विभाग को पहले से थी'
सूत्रों का यह भी दावा है कि जिले में संचालित अधिकांश अवैध अस्पतालों, नर्सिंग होम और क्लीनिकों की जानकारी संबंधित अधिकारियों को पहले से थी। आरोप है कि कार्रवाई तब तेज हुई जब बड़े अग्निकांडों के बाद शासन ने सख्ती दिखाई।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
सबसे बड़ा सवाल
यदि बेसमेंट में अस्पताल संचालन पहले से नियमों के विरुद्ध था, तो समय रहते स्थायी कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि कार्रवाई केवल बड़े हादसों के बाद ही होती है, तो क्या विभागीय निरीक्षण व्यवस्था वास्तव में प्रभावी है?
इन सभी सवालों का जवाब विभागीय जांच और संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक पक्ष के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। फिलहाल, बरेली में स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई जितनी चर्चा में है, उससे कहीं अधिक उसकी कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं।
Comments
Post a Comment