आजादों के आजाद महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद,

 मुनेश त्यागी

मजूर आ  किसान  आ  वतन  के  नौजवान  आ 
तुझे सितम की सरहदों के पार अब निकालना है 
यह राह पुरखतर है पर  तुझे  इसी  पे  चलना  है 
जमाने को  बदलना  है, जमाने  को  बदलना  है।

और 

वही सब गजनवी अंदाज होगा
वतन को लूटने का काज होगा,
शहीदों ने कभी सोचा नहीं था 
उन्हीं के कातिलों का राज होगा।

      हमारे देश की आजादी के आंदोलन में, भारत के करोड़ों लोगों ने हिस्सा लिया था और आजादी की बहुत ही महत्वपूर्ण जंग में, भारत के लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी जानें कुर्बान की थीं। इनमें मुख्य रूप से टीपू सुल्तान, बहादुर शाह जफर, नाना साहब, मंगल पांडे, महारानी लक्ष्मीबाई, पीर अली, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाकउल्ला खान, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, शहीद ए आजम भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, मातादीन बाल्मिकी और धनसिंह कोतवाल आदि के नाम प्रमुख हैं। मेरठ के विष्णु शरण दुबलिश भी चंद्रशेखर आजाद के साथी थे और वे हिंदुस्तान समाजवादी रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य भी थे। इन्हीं में हमारे देश की आजादी के महान स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी और आजादों के आजाद, चंद्रशेखर आजाद भी शामिल थे। आज उन्हीं चंद्रशेखर आजाद का जन्म दिन है।
       1921 के असहयोग आंदोलन में 15 साल के सत्याग्रही शहीद चंद्रशेखर से अदालत ने सवाल किया था कि "तुम्हारा क्या नाम है?" इस पर इस सत्याग्रही बालक ने जवाब दिया था,,,,, "आजाद, पिता का नाम,,, आजादी, और घर,,,, जेलखाना।" इन गज़ब के जवाबों से चिढकर, मजिस्ट्रेट ने इस बालक को 15 बेंतों की सजा दी थी, तो हर बेंत लगने पर इस बालक ने" महात्मा गांधी की जय" का नारा लगाया था। यही बालक आगे चलकर चंद्रशेखर"आजाद" नाम से विश्व प्रसिद्ध हुआ। इनका नाम चंद्रशेखर था। जंगेआजादी के दौरान आजाद का संबंध मेरठ से भी रहा है क्योंकि काकोरी कांड के बाद, वे मेरठ के वैश्य अनाथालय में भी आये थे। 
        मध्य प्रदेश के भाबरा ग्राम में पैदा हुए इस बालक की मां का नाम जगरानी देवी और पिता का नाम पं सीताराम तिवारी था। 1922 में यह बालक क्रांतिकारी पार्टी में प्रवेश करता है। अपनी लगन, अनुशासन और भारत को आजाद कराने के लक्ष्य के कारण, यह क्रांतिकारी बालक, आगे चलकर हिंदुस्तान समाजवादी गणतंत्र संघ के चेयरमैन बनें और नौ साल तक फरारी का जीवन व्यतीत करते हैं और अपने दल के उद्देश्यों को अबाध गति से आगे बढ़ाते हैं। उनकी समझबूझ, सतत चौकसी, और सतर्कता, उन्हें आजाद रखती है और वे कभी भी अंग्रेजों के हाथ नही आये और अंततः उन्होंने 27 फरवरी 1931 को ऐल्फ्रेड पार्क इलाहाबाद में अंग्रेजों से जंग करते हुए, भारत माता की स्वाधीनता के लिए, अपने प्राणों की आहुति दे दी।  चंद्रशेखर आजाद की शहादत के बाद इलाहाबाद में एक शोक सभा हुई थी जिसकी अध्यक्षता कांग्रेसी नेता टंडन ने की थी और इसमें जवाहरलाल नेहरू ने भाग लिया था और चंद्रशेखर आजाद की शहादत को बहुत बड़ी क्षति बताया था।
      आजाद स्पष्टवादी, कट्टर सिध्दांतवादी और तय किये गये फैसलों को सख्ती से लागू कराने वाले कार्यकर्ता और सेनापति थे। उनका कहना था कि "हमारा दल आदर्शवादी क्रांतिकारियों का दल है, देशभक्तों का दल है, हत्यारों का, डकैतों का नही।" उनके दिल में समस्त मानवजाति के लिए श्रध्दा और आदर का अगाध भंडार था। वे सशस्त्र क्रांति के रास्ते पर सवार हो गए थे। उनकी क्रांति का उद्देश्य मानव मात्र के लिए सुख और शांति का वातावरण तैयार करना था। वसुघैवकुटुम्भकम ही उनका उद्देश्य था। वे किसी व्यक्ति विशेष के विरोधी नही थे। 
    आजाद की मान्यता थी कि "जिसकी आंखों में सबके लिए आंसू नहीं और जिसके दिल में सबके लिए प्यार नही, वह शोषक और अन्यायी व अत्याचारी से घृणा भी नही कर सकता और अंत तक उससे जूझ भी नही सकता।" वे आला दर्जे के संगीत प्रेमी भी थे।
     आजाद, अपने सभी साथियों से और सबसे ज्यादा पढने लिखने का आग्रह किया करते थे। कार्ल मार्क्स और फ्रेड्रिक एंगेल्स की विश्व प्रसिद्ध क्रांतिकारी किताब "कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो" उन्होंने अपने साथी शिववर्मा से शुरू से आखिर तक सुनी थी। वे उस समय के तमाम राजनीतिक सवालों और सैध्दांतिक सवालों पर हुई बहसों में जमकर हिस्सा लेते थे। शोषण का अन्त, मानव मात्र की समानता और वर्ग रहित समाज की कल्पना और समाजवाद की बातों से वे मंत्रमुग्ध हो जाया करते थे आजाद अपने को "समाजवादी" कहलाने में सबसे ज्यादा फक्र मेहसूस किया करते थे। 
      उन्होंने गरीबी, भुखमरी, मजदूरों और मेहनतकशों की दुर्दशा अपनी आंखों से देखी, समझी और सहन की थी, अतः इनके खात्मे के लिए वे दृढतम थे। इसी कारण वे "मजदूरों और किसानों के राज्य" के सबसे बड़े हिमायती बन गये थे। आजाद अपने दल के सेनापति ही नही बल्कि अपने समाजवादी परिवार के अग्रज भी थे। अतः अपने साथियों की दवाई, कपड़ों, जूतों, पैसे, हथियारों आदि छोटी छोटी जरूरतों का सबसे ज्यादा ध्यान रखते थे। 
     वे फासीवाद और साम्राज्यवाद के कट्टर दुश्मन थे। वे मानते थे कि फासीवाद क्रांति के पहियों को पीछे खींचता है और साम्राज्यवाद की सत्ता और ताकत को मजबूती प्रदान करता है और जनता की आंखों में धूल झोंककर, पूंजीवाद को समाप्त होने और मरने से बचाता है। फासीवाद, पूंजीवाद और साम्राज्यवादी व्यवस्था का विनाश करके वैज्ञानिक समाजवादी गणतंत्र कायम करना, चंद्रशेखर आजाद और उनके साथियों के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य था। वे ताउम्र इसी ख्वाब के लिए जिये और इसी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी।
    आजाद और उनके हिन्दुस्तानी समाजवादी गणतंत्र संघ यानी (एच एस आर ए) के तमाम सदस्य, लुटेरे अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीतियों की हकीकत को जान पहचान गये थे। इसीलिए उनके नारे भी बदल गए थे जैसे "साम्राज्यवाद मुर्दाबाद" और "इंकलाब जिंदाबाद।" वे भारत की जनता का कल्याण, उस व्यवस्था के क्रांतिकारी परिवर्तन के बाद, किसानों मजदूरों की राजसत्ता और सरकार की स्थापना में देखते थे। वे साम्राज्यवादी निजाम का पूर्ण खात्मा करना चाहते थे, इसीलिए वे खुलेआम और अदालत में "साम्राज्यवाद मुर्दाबाद" और "इंकलाब जिंदाबाद" जैसे  क्रांतिकारी नारे लगाते थे।
       साम्राज्यवाद कैसे फासीवादी मानसिकता और नीतियां हासिल कर लेता है, इसका अंदाज उन्हें था। फासीवाद जनता को गाफिल कर देता है, जनता को अपने कल्याण की नीतियों से दूर ले जाता है, भाई को भाई से लडाता है, उसके सोचने की शक्ति में घुन लगा देता है, उसकी एकता को पूरी तरह से नेशनाबूद कर देता है और उसे पूंजीवाद और साम्राज्यवाद का आसान शिकार बना देता है। उनकी और उनके साथियों की दूरदृष्टि कितनी गजब की और सटीक थी, उसका नमूना हम आज देख रहे हैं। फासीवाद किन जालिमाना तरीकों से साम्राज्यवाद की सेवा करता है और जनता को बांटकर, आपस में लडवाता है, इसका बहुत ही सटीक नमूना हम आज अपने देश में देख रहे हैं, जिसे वर्तमान साम्प्रदायिक सरकार बखूबी अंजाम दे रही है और वह जनता की एकता तोड़कर, दुनियाभर के लुटेरे पूंजीपतियों की मदद कर रही है और भारत को उनका एक चारागाह बना दिया है।
     परिस्थितियों, साजिशों, बेइमानी, मुखबिरी और घात का खेल देखिये कि आजाद के पिताजी का नाम पं सीताराम तिवारी था। दल का यानी,,,  एच एस आर ए,, के चंदे का पैसा, उन्हीं के दल के परिचित बलभद्र तिवारी के पास जमा था। अपनी गतिविधियों के आगे बढ़ाने के लिए चंद्रशेखर आजाद, यही पैसा लेने के लिए बलभद्र तिवारी के पास गये थे और इलाहाबाद के एलफ्रेड पार्क में पैसे आने का इंतजार कर ही रहे थे कि पैसा तो आया नही, अंग्रेजों की पुलिस जरूर आ गयी, जिससे आजाद को अकेले ही लडना पडा और लडते लडते वीर गति को प्राप्त हो गए। अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अंग्रेज जीते जी, आजाद को हाथ न लगा सके, वे अपनी जिंदगी की अंतिम सांस तक "आजाद" ही रहे।
     हमारे स्वतंत्रता सेनानी ताऊजी,,,, ओमप्रकाश त्यागी और प्रणाम सिंह त्यागी समय-समय पर हमें जंगे आजादी के दौरान गाए जाने वाले गीतों की कुछ पंक्तियां सुनाया करते थे। जैसे वे पंक्तियां चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, बिस्मिल, अशफ़ाकउल्ला खान, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह और सुभाष चंद्र बोस को ध्यान में रखकर ही लिखी गई थीं। चंद्रशेखर आजाद की शहादत दिवस पर आज उन्हीं पंक्तियों की याद आ रही है। आप भी उन कमाल की पंक्तियों पर एक नजर डालिए,,,
हम फानी नहीं हैं फनाह क्या  करेंगे 
हमें  मारकर  वो  भला  क्या  करेंगे? 
हथेली पर जो सर लिए फिर  रहे  हों 
वे सर उनका धड से जुड़ा क्या करेंगे?
     यहां पर यह जानना भी बेहद जरूरी है कि जिस हिंदुस्तान समाजवादी रिपब्लिकन एसोसिएशन के, चंद्रशेखर आजाद अध्यक्ष थे, वह क्या चाहती थी? उसके उद्देश्य और लक्ष्य क्या थे? और इसी के साथ साथ उसके तमाम सदस्य और हमारे दूसरे शहीद क्या चाहते थे? यहां पर यह जानना सबसे जरूरी है कि हिंदुस्तानी समाजवादी रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य कैसे देश का नजारा देखते थे?, कैसे समाज का नजारा देखते थे? आइए जानें  कि हमारे तमाम शहीद और चंद्रशेखर आजाद और उनके तमाम क्रांतिकारी साथी, कैसे देश का और समाज का नजारा देखते थे? वे चाहते थे कि,,, 
हमारा देश ऐसा हो कि,,,,,
जहां न भूख हो, न नग्नता हो,
जहां न गरीबी हो, न अमीरी हो, 
जहां न जुल्म हों, न अन्याय हो,
जहां बस प्रेम हो और एकता हो, 
जहां इंसाफ हो, सब आजाद  हों, 
जहां सुंदरता हो और जहां सुख हो।
     इसी के साथ यानी हिंदुस्तानी समाजवादी रिपब्लिकन एसोसिएशन के उद्देश्य भी कमाल के थे। आइए जानें उनके क्या उद्देश्य थे? उनके कमाल के उद्देश्य थे,,,, 
सशस्त्र क्रांति द्वारा गणराज्य की स्थापना,
शोषण पर आधारित व्यवस्था का खात्मा,
पूरे विश्व में मेलजोल कायम हो, 
किसानों मजदूरों की एकता हो,
राष्ट्रीय मुक्त के लिए क्रांति हो,
प्रकृति की देन पर और प्राकृतिक संसाधनों पर सबका अधिकार हो और इनका प्रयोग पूरे के पूरे हिंदुस्तानियों के विकास के लिए किया जाए, चंद धन्ना सेठों के विकास के लिए ही नही,
पंचायती राज्य कायम हों,
गुलामी का खात्मा हो, 
हिंदू मुस्लिम एकता हो, 
आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक असमानता का पूरी तरह से खात्मा हो, 
साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और 
इंकलाब जिंदाबाद।
     देखिए, उनके जो उद्देश्य आज से 95 साल पहले थे, वे आज भी प्रासंगिक हैं, उन उद्देश्यों को आज भी अमल में उतारना जरूरी है, तभी हमारा देश असलियत में आजाद होगा और तभी हमारा देश, एचएसआरए के सदस्यों का और हमारे शहीदों के सपनों का देश होगा।
       मगर अफसोस, आज जब हम देखते हैं कि यह चंद्रशेखर आजाद के सपनों का भारत नही है, यहां फासीवादी, पूंजिवादी और हिंदुत्ववादी संप्रदायिक ताकतों का गठजोड़, लुटेरी राजसत्ता और शोषणकारी पूंजीपतियों का, खैरख्वाह बना हुआ है, तो आजाद के सपनों के सामने, शीश नवाना ही पडता है। उस अमर स्वतंत्रता सेनानी के सपनों के हिंदुस्तान पर चलना और उन्हें पूर्ण करना और धरती पर उतारना, यहां के सब मजदूरों, किसानों, छात्रों, नौजवानों और तमाम साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी है, तभी आजाद के सपनों का भारत बन सकता है, तभी उन्हें हजारों साल पुराने अन्याय, गुलामी, शोषण, जुल्मो सितम, अत्याचार, गैर-बराबरी, भेदभाव और छूआछूत से मुक्ति मिल सकती है, निजात मिल सकती है।
     95 साल के बाद भी यह बात पूरे इत्मीनान और यकीन के साथ कहीं जा सकती है कि वर्तमान शोषणकारी सामंती और पूंजीवादी व्यवस्था, जनता के दुख दर्दों को दूर नहीं कर सकती। उनकी परेशानियों और समस्यायों का हल उसके पास नहीं है और उनकी समस्याओं का समाधान केवल और केवल क्रांति द्वारा स्थापित और संचालित वैज्ञानिक समाजवादी व्यवस्था और विचारधारा और किसानों मजदूरों की सत्ता और सरकार ही कर सकती है। इसके अलावा उनकी समस्याओं का समाधान नही किया जा सकता है। उनकी याद में हम तो यही कहेंगे,,,, 
जात धरम के झगड़े छोड़ो 
समता ममता की बात करो, 
बहुत रह लिए अलग थलग 
अब मिलने जुलने की बात करो। 
और
सारे ताने-बाने को बदलो
पूरे भाईचारे की बात करो,
हारे थके आधे अधूरे नहीं 
पूरे इंकलाब की बात करो।

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